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आँसुओं का समंदर : नज़्म

                
                                                         
                            आँसुओं का समंदर भी आखिर उतर जाएगा,
                                                                 
                            
दर्द का हर सिलसिला एक दिन ठहर जाएगा।

मत छिपाओ पीर को मुस्कानों की ओट में,
मौन का यह हिमशिखर भी स्वयं पिघल जाएगा।

जो बिछुड़कर खो गया, वह स्मृति बन महकेगा,
उसका उजास अंतर्मन में दीप-सा रह जाएगा।

रात चाहे कितनी भी अपनी स्याही ओढ़ ले,
भोर का पहला सुनहरा अक्षर उभर आएगा।

टूटकर बिखरा हुआ दर्पण न समेटो अब,
हर किरच में नया आकाश ही नज़र आएगा।

पीर जब तपकर हृदय की अग्नि में कुंदन बने,
वेदना का हर कण अमृत बन निखर जाएगा।

धैर्य की चुप साधना निष्फल कभी होती नहीं,
बीज हर संघर्ष का वन बनकर लहराएगा।

छोड़ दो कुछ अश्रुओं को आज बह लेने भी दो,
मन का रुका हुआ निर्झर तभी सँवर पाएगा।

ज़िंदगी हर हार का प्रतिफल भी दे जाती है,
गिरने वाला ही किसी दिन शिखर पर छा जाएगा।

आँसुओं का समंदर किनारा माँगता नहीं,
जो स्वयं डूबा नहीं, वह किसे उबार पाएगा।
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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