द्वंद्व की वेदी पर मन कितने ही प्रश्न सजाता है,
मृगतृष्णाओं के पीछे चलकर पथ भी भरमाता है।
चयन-जाल में उलझी दृष्टि जब थककर रुक जाती है,
तब चेतन के सम्मुख मौन खड़ा विकल्प मुस्काता है।
तिमिर की गोद में बैठा रहता अनजाना-सा प्रहर,
भीति की आहट से काँप उठता अंतर का निर्जन घर।
शून्य दिशाओं में सन्नाटा जब स्वर बनकर बहता है,
तब जीवन का हर एक कदम भय से बँध-सा रहता है।
कहीं स्वर्ण के कलश सजे हैं, कहीं सूखी पड़ी है धार,
कहीं वसंत की मधु-गंध, कहीं पीड़ा का विस्तृत संसार।
धरा की कोख स्वयं पूछती है—यह कैसा विभाजन है,
क्यों मानव के भाग्य-ललाट पर अंकित विषमता है।
मुखौटों की भीड़ लगी है, सत्य अकेला मौन खड़ा,
झूठ के ऊँचे प्रासादों ने विश्वासों को आज जकड़ा।
रजत-सी चमक लिए छल जब युग का श्रृंगार बन जाता है,
तब चरित्रों पर गहरा होकर असत्य का आवरण छा जाता है।
दर्पण के पृष्ठों पर कितनी धुँधली होती जाती छवि,
विकृति के सायों में खो जाती मन की कोमल कविता।
किन्तु व्यथा के गर्भ से ही सौंदर्य नया आकार धरता है,
क्योंकि कुरूप के अट्टहास से भी सृजन अमर उभरता है।
अतः अंधेरों से संघर्ष ही जीवन का सत्कार है,
तम के पार ही छिपा हुआ नव प्रभात का संसार है।
- सनातन मुकुंद
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