विरागी स्वप्न-रथ पर, सवार होकर मन खड़ा,
अतल में खोजता जिसे, वही सत्य-सार खरा।
सब कोलाहल थम जाएँ, मौन-विस्तार अपार,
प्रतीक्षा उस दिन की, जब मिटेगा तम-द्वार।
अहं भस्म होकर फिर, चेतना का उदय होगा,
विलीन बूँद होकर सिंधु में, स्वयं ही लय होगा।
तब अनुगूँजेगी श्वासों में, अनहद का वह राग,
प्रतीक्षा के क्षण में, जगेगा वह परम-अनुराग।
- सनातन मुकुंद
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