एक पत्ता धीरे-धीरे वृक्ष की
अनकही प्रार्थना
बनकर झरता है।
धरती उसे गिराती नहीं,
अपने मौन आलिंगन में
धीरे से छिपा लेती है।
नदी अंतिम मोड़ पर
अपना समूचा नाम
जल में विलीन कर देती है।
समुद्र उसे पहचानता नहीं,
केवल अपने अथाह मौन में
समेट लेता है।
दीप बुझता नहीं,
अपनी अंतिम लौ का
एकांत सौंप देता है।
धुआँ ऊपर उठता हुआ आकाश की
अनलिखी लिपि पढ़ता जाता है।
बीज मिट्टी के अंधे गर्भ में
प्रकाश का रहस्य बोता है।
दर्पण चेहरा नहीं, उतरते हुए
अहंकार का रिक्त स्थान देखता है।
शून्य रिक्त नहीं, अनाम उपस्थिति का
सबसे प्राचीन निवास है।
और तब— मृत्यु केवल देह का
त्याग नहीं, मौन का उद्घाटन है।
- श्री सनातन मुकुंद
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