निशि के नील निरेख गगन में, किसने तिमिर बिछाया?
किस मृग-मरीचिकामय छवि ने, स्वर्ण-विपथ दिखलाया?
दीप न बोला—"कौन हर गया, स्नेहिल तैल-कलश मेरा?"—
ज्वाला बन निज प्राण जला, निज सत्य स्वयं अपनाया॥
पारिजात-पंखुरि-सी श्रद्धा, झरती रही निःशब्द,
अश्रु-अर्घ्य से धुलता जाता, अंतःयज्ञ विशुद्ध।
टूटे दर्पण में भी देखा, एक अखण्ड प्रभामण्डल—
खण्ड-खण्ड प्रतिबिम्बों में भी, पूर्ण रहा परबुद्ध॥
माया-मेखल विलय हुई जब, व्योम हुआ निर्वर्ण,
शून्य-कमल पर जाग उठा तब, प्रणव-प्रदीप्त चरण।
बूँद न बोली—"सिन्धु पराया"—लय ही उसका जीवन,
स्वत्व-शैल गलकर बह निकला, बन अद्वैत-सलिल-कण॥
विश्वासों की वीणा टूटी, अनहद राग न टूटा,
छिन्न तन्तुओं में भी गूँजा, नित्य अनन्त अच्युत।
राग स्वयं वैराग्य बना जब, मौन हुआ आलाप,
श्वास-श्वास में दीक्षित होने लगा स्वयं प्रतिताप॥
अब न मिलन, न विरह, न कोई स्मृति-विषाद-अवशेष,
भस्म-वसन में दीप्त खड़ा है, चिर-अक्षय अवशेष।
दीपक का सौभाग्य यही है—जलकर नभ को छू ले,
राख नहीं, वह अग्नि बने जो, सूर्योदय में घुल ले॥
यदि कोई पूछे—"प्रेम कहाँ?"—मुस्कानें उत्तर दें—
"जहाँ 'मैं' का अंतिम कम्पन, मौन-अनन्त में क्षीण।"
विश्वासों का सत्य न टूटे, टूटें केवल बन्धन—
अनाहत-अर्चि वहीं प्रज्वलित, जहाँ विलय हो 'अहम्'॥
— श्री सनातन मुकुंद
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