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अनहद के जुलाहे : कबीर-जयंती गीतिकाव्य

                
                                                         
                            काशी के कण-कण में आज पुनः करुणा की वीणा जागी,
                                                                 
                            
जुलाहे के करघे पर फिर अनहद की धुन अनुरागी।

सूत नहीं, वे बुनते थे चेतन-चन्द्रिका के तंतु,
घट-घट के गुप्त गगन में गूँज उठे शून्य के मंत्र।

जब बोले, वाणी बन बैठी निर्झर की निर्मल धारा,
अक्षर-अक्षर दीप बना, तम ने पहना ज्योति-दुपट्टा सारा।

माटी के मूक कणों में उन्होंने ब्रह्म-स्वर सुन डाला,
अलख-अग्नि की राख तले छिपा अमृत-बीज उगाला।

मंदिर की घंटी में देखा, मस्जिद की अज़ाँ में देखा,
हर श्वास के शंख-निनाद में एक ही सत्य-सुदीर्घ रेखा।

बीच भँवर के बहता पाया शांत सिन्धु का संगीत,
चादर के हर तंतु में झिलमिल करती अद्वैत-प्रीत।

मन के दर्पण पर उतरी जब सहज समीर की छाया,
माया की मणिमालाओं ने तब अपना भार भुलाया।

सत्य का सूर्य उगा, तो झरने लगे विभ्रम के तारे,
निर्गुण के नील गगन में उड़ने लगे मौन-पखेरू सारे।

जयंती की इस ज्योति-वेला में फिर वही पुकार सुनाएँ,
हर धड़कन को साखी करके अंतर का द्वार जगाएँ।

कबिरा अब भी करघे पर समय की चादर बुनता है,
"साहिब" का वह एक स्वर आज भी जग में गूँजता है।
-सनातन मुकुंद
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2 महीने पहले

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