गगन की स्वर्ण-वर्षा-बिंब-सा वह,
सजी लटकन सुनहरी गंध-लहरी।
धरा के भाल पर यह दीप्ति-रेखा,
नयन को तृप्त करती वर्ण-लहरी॥
न हो आभास-मात्र यह पुष्पमाला,
विधाता की रची पावन कला है।
स्वयं में ही स्वयं को ढूँढ़ती-सी,
तपी ग्रीष्म की शीतल प्रार्थना है॥
- सनातन मुकुंद
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