अँधियारी रात ढली, पूरब में सूरज आया,
वीरों के बलिदानों ने, आज़ादी का दीप जलाया।
जिनने हँसकर प्राण दिए, उनको नमन हमारा,
उनके सपनों से ही तो, आज सजा देश हमारा।
भगत, सुभाष, आज़ाद—अमर रहे बलिदान,
उनकी पावन यादों से, रोशन हिंदुस्तान।
टूटीं बेड़ियाँ, खुला गगन, लहराया तिरंगा,
हर भारतवासी के मन में, जागी नई उमंग।
गंगा की निर्मल धारा में, आज़ादी का गान,
गाँव-गाँव से शहरों तक, गूँजा हिंदुस्तान।
भाषा, बोली, वेश अनेक, फिर भी देश हमारा,
सबके सुख-दुख में बसता है, भारत माँ का प्यारा।
मंदिर हो या मस्जिद हो, प्रेम रहे हर द्वारे,
मिल-जुलकर हम आगे बढ़ें, यही स्वप्न हमारे।
आज़ादी का अर्थ यही—हम अपना दीप जलाएँ,
मन के भीतर के अँधियारे, मिलकर दूर भगाएँ।
सत्य, न्याय और धर्म के बल पर, भारत आगे जाए,
हर दिल में जब देश बसे, नया सवेरा आए।
- श्री सनातन मुकुंद
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