आगे कुआँ गहन अँधेरा, पीछे खाई काली,
विवश पथिक बीच खड़ा, कैसी रीति निराली।
इधर मृगतृष्णा मधु बरसाए, उधर दहकती ज्वाला,
दोनों अपने जाल बिछाकर, बन बैठे रखवाला।
कुआँ कहे—“मेरे जल से तो, प्यास तुम्हारी जाएगी,”
खाई हँसकर—“मेरी गहराई, तुझको राह दिखाएगी।”
एक सुनाए मीठे सपने, दूजी भय दिखाए,
मिलकर दोनों प्यासे पथिक को, अपने पास बुलाएँ।
ऊपर बादल ढोल बजाएँ—“जल की घटा निराली,”
नीचे धरती फटी पड़ी है, सूखी उसकी प्याली।
छाँव खोजता वृक्ष स्वयं ही, धूप में झुलसा जाए,
हरियाली के गीत सुनाने वाला, पत्ता-पत्ता सूख जाए।
पथिक खड़ा मौन रहा, फिर अधरों पर हँसी आई,
बोला—“कुएँ और खाई से, गहरी है मन की खाई।
भय को भाग्य मानकर बैठूँ, तो जीवन भी हारूँ,
अपने पथ का दीप जलाकर, क्यों न स्वयं राह सँवारूँ?”
कुआँ रहे तो प्यास बुझाऊँ, खाई हो तो पुल बाँधूँ,
काँटों से भरी राह मिले तो, श्रम से पगडंडी साधूँ।
दोष न दूँ मैं काल-चक्र को, न भाग्य-भरोसे सोऊँ,
जिस दिशा विवेक पुकारे, उसी दिशा में चलूँ।
कुआँ कहे या खाई बोले, संकट अपना काम करे,
जिसके भीतर दीप विवेक का, तम से क्यों वह डरे?
राह नहीं मिलती जग में तो, राह स्वयं बनानी है,
आगे कुआँ, पीछे खाई—फिर भी राह बनानी है।
- सनातन मुकुंद
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