अंधेरी रात के सीने से, होता सहर का आगाज़,
जो ख़ुद में डूब जाते, वहीं से सफ़र का आगाज़।
अश्क की बूँद गिरे तो, वो सोज़-ए-दिल लगती है,
उसी इक क़तरे से, होता नज़र का आगाज़।
अना का बुत गिराना ही, इब्तिदा-ए-इबादत है,
फ़ना होकर ही होता, रूह के असर का आगाज़।
कहाँ ढूँढे उसे दुनिया में, वो तो रूह में ज़ाहिर है,
जो मिट गए ख़ुद में, वही रहगुज़र का आगाज़।
लम्स-ए-बाद से झरे, न जाने कितने बर्ग-ए-ख़िज़ाँ,
वीरानी-ए-ख़िज़ाँ में, होता हुनर का आगाज़।
कूचा-ए-मुहब्बत में, क़दम रखना बड़ी मुश्किल है,
यहीं से मुसाफ़िर का, ज़ब्त-ए-सबर का आगाज़।
'मुकुंद' दश्त-ए-ग़म पर, तुख़्म-ए-ख़ुशी बोना है,
जहाँ से ख़त्म होते हैं, वहीं से बसर का आगाज़।
- सनातन मुकुंद
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