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पंजा, लड़ा कर देखिये

                
                                                         
                            कभी काँटों को गले, लगा कर देखिये
                                                                 
                            
कभी पत्थरों में रस्ता, बना कर देखिये
रंग जायेगा जमाना तुम्हारे ही रंग में,
मोहब्बत की महफ़िल, सजा कर देखिये
इक तुम ही हो दुनिया में अकेले सुर्ख़रू,
अपने गुमां को दिल से, भगा कर देखिये
न भूलना कि दुनिया फरामोश है दोस्त,
शक है ज़रा भी तो, आजमा कर देखिये
कब तक जीओगे 'मिश्र' गैरों के वजूद पे,
खुद भी आफ़तों से पंजा, लड़ा कर देखिये
-शांती स्वरूप मिश्र
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
21 घंटे पहले

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