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किससे कहूँ

                
                                                         
                            दिल की हसरतें कहूँ तो किससे कहूँ !
                                                                 
                            
अपनी मुश्किलें कहूँ तो किससे कहूँ !
मैं फंस गया यारों के फ़रेबों में खुद ही,
अपनी ये उलझनें कहूँ तो किससे कहूँ !
जिससे भी कहूँ सरक जाता है चुप से,
दिल की हलचलें कहूँ तो किससे कहूँ !
सभी तो भरते हैं दम मुझसे दोस्ती का,
अपनी ये अदावतें कहूँ तो किससे कहूँ !
दुनिया तो समझती हैं कि नायाब हूँ मैं,
पर अपनी हक़ीक़तें कहूँ तो किससे कहूँ !
खामखा भटकता है ये दिल आज कल,
अब इसकी हरकतें कहूँ तो किससे कहूँ !
बहुत रंग बदले हैं इस ज़िंदगी ने 'मिश्र',
पर उसकी वहशतें कहूँ तो किससे कहूँ !
-शांती स्वरूप मिश्र
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2 घंटे पहले

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