हमसे बेकार का ये दिखावा, देखा नहीं जाता
हमसे फरेबों से भरा तमाशा, देखा नहीं जाता
बड़ी ही बेढंगी हो गयी है ये आज की दुनिया,
ग़र्ज़ के लिए यूं बदल जाना, देखा नहीं जाता
मर चुकी हैं आत्माएं लोगों की इस ज़माने में,
अब ईमानो धरम का गंवाना, देखा नहीं जाता
मरे को मारने का हो चला है चलन सा अबतो,
किसी भी मजबूर को सताना, देखा नहीं जाता
तंग आ चुका है दिल इस बेरहम सियासत से,
अब इस कदर सबसे छलावा, देखा नहीं जाता
लोग बच्चों के नाम पर भुला बैठे माँ बाप को,
उनका हर पल यूं रुलाना, अब देखा नहीं जाता
इस तरह जीने से बेहतर है कि मर जाएँ "मिश्र",
क्योंकि नफरतों का मेला, अब देखा नहीं जाता
-शांती स्वरुप मिश्र
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