शजर महफ़ूज़ रहता ही नहीं है
जो आंधी में लचकता ही नहीं है
हज़ारों कोशिशें ऐ "शम्स"करलो
गुल ए काग़ज़ महकता ही नहीं है
-शम्स कुंडवी
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