रह ए मुफ़लिसी से गुज़रना पड़ा है
मुझे टूट कर के बिखरना पड़ा है
सवालात ग़ुर्बत में कर-कर के अक्सर
मुझे अपनी नज़रों में मरना पड़ा है
फ़क़त इक ख़ुशी के लिए ज़िन्दगी की
समुन्दर में ग़म के उतरना पड़ा है
बहारों की इज़्ज़त की ख़ातिर गुलों को
कभी ख़ुद ब ख़ुद ही संवरना पड़ा है
अजब रौब मजबूरियों का है लोगों
जो करना न था वो भी करना पड़ा है
कोई तो ज़रूरत ज़रूर आ पड़ी है
ये जो पांव चौखट पे धरना पड़ा है
नदी भी नहीं रखती मुर्दों को अंदर
जो है लाश उसको उभरना पड़ा है
-शम्स कुन्डवी
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