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बुलंदी क्यों न पा जाएं भले कितना भी हम लेकिन

                
                                                         
                            न आए ज़िंदगी में फिर ग़मों की रात मां अम्बे
                                                                 
                            
रहे हम पर तुम्हारी रहमतों का हाथ मांअम्बे

सुगंधित हो ये उपवन और उस के फूल हर कलियां
मुहब्बत की सदाएँ दे सब उस के पात मां अम्बे

हो जाएं दूर दुनिया से परस्पर द्वेष के दुर्दिन
हर इक दिल में सजे बस प्यार की बारात मां अम्बे

बुलंदी क्यों न पा जाएं भले कितना भी हम लेकिन
ज़मीं से हर घड़ी कायम रहे जज़्बात मां अम्बे

जो देना है तो दे देना यही वरदान दुनिया को
लगाए आदमी ना आदमी पर घात मां अम्बे

अगर क़ुर्बान जाऊँ तो वतन के वास्ते जाऊँ
हमें देना अनूठी इक यही सौगात मां अम्बे

करें ना आचरण वह जो न चाहें ख़ुद भी औरों से
हमारे ध्यान में हर दम रहे ये बात मां अम्बे

बदल जाए भले कोई करम इतना रहे तेरी
न छोड़ें हम कभी इंसानियत का साथ मां अम्बे

तू ही जननी, तू पालनहार, तू संहार की देवी
सिवा तेरे भला किस में है ये औकात मां अम्बे
-शंभू शरण मंडल
 
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1 hour ago

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