अब यहाँ मन नहीं लगता!
न जाने मन क्यों उचट गया।
शब्द भी पत्थर होते हैं।
और अपने जब पत्थर फेंकें,
घाव बहुत गहरे होते हैं।
उनके शब्दों के तीखे तीर,
सीधे सीने में उतर गया।
न जाने मन क्यों उचट गया।।
क्या कहा,
“इसीलिए कहीं सम्मान नहीं मिलता!
वाह, मेरा क्या सम्मान कर दिया!”
हँसकर सह तो लेता हूँ।
पर भीतर ही भीतर,
सब कुछ टूट-सा गया।
न जाने मन क्यों उचट गया।।
मैं कोई सामान नहीं
जो यहाँ से वहाँ,
चाहे जिधर रख दो।
न कोई पालतू ही हूँ कि,
बथान पर बाँध दिया जाए।
जो मिला, जब मिला, खाऊँ..
चुपचाप बैठा पागुराऊं!
जब चाहो डाँट दो,
जहां चाहो हांक दो,
पूरा दूध दूह लिया और,
कसाईयों सा काट गया।
न जाने मन क्यों उचट गया।।
आँखें भर आती हैं,
पर आँसू छिपा लेता हूँ।
सीना छलनी होता है,
पर दर्द दबा लेता हूँ।
हाँ, बस एक समानता है,
मेरे और उस मूक में,
रोकर दिखा नहीं सकते।
सब भीतर ही निगल गया।
न जाने मन क्यों उचट गया।।
मैं भूल गया था कि,
अब बूढ़ा हो चला हूँ।
हँसना, खिलखिलाना,
सारी खुशियां बटोरकर,
तस्वीरों में कैद करना,
अब मेरे हिस्से में नहीं!
अपने सुख के दो पल
दुनिया से बाँट लेना,
क्या मेरा अधिकार निबट गया?
न जाने मन क्यों उचट गया।।
क्या उम्र बढ़ जाने से
मन बूढ़ा हो जाता है?
क्या सफेद बालों के साथ
हँसने का अधिकार भी
चला जाता है?
मैंने तो बस चाहा था,
किलकारियों के बीच,
कुछ पल अपने लिए जी लूँ।
पर अतीत की धूप समेटने से,
पहले ही दिन ढल गया।
न जाने मन क्यों उचट गया।।
आँखों में नमी होगी तो होगी,
पर सपनों से मुँह नहीं मोड़ूँगा।
अब शायद चुप रहूँगा,
पर पत्थर नहीं बनूँगा।
अपने इन घावों पर मैं,
तुम्हारी मुस्कान रखूँगा।
क्योंकि उम्र चाहे जितनी हो जाए,
दिल तो धड़कता है।
खुश होने का हक़ तो नहीं मर गया।
न जाने मन क्यों उचट गया।।
न किसी से छीना कुछ,
न किसी का रास्ता रोका।
बस अपने हिस्से की खुशी माँगी,
बूढ़ा आदमी हँस नहीं सकता..
यह क्यों समझ लिया गया।
न जाने मन क्यों उचट गया।।
क्योंकि मैं कोई सामान नहीं,
एक धड़कता हुआ इंसान हूँ।
मेरी भी इच्छाएँ हैं,
मेरी भी खुशियाँ हैं,
मेरी भी कुछ उड़ानें हैं।
उम्र भले ही सत्तर की हो,
दिल आज भी जवान है।
अब यहाँ मन नहीं लगता,
तो कहीं और सही…
जहाँ उम्र नहीं,
जेन जी, जेन अल्फा नही,
जेन-ग्रैंड (Gen-G) ही सही।
सम्मान गहरा हो और
खुशियों पर पहरा न हो।
अपने मन को अपमान से
अब ऊपर रखना सीख लिया,
यहीं से मेरा सम्मान शुरू हो गया।”
यहीं से मेरा सम्मान शुरू हो गया।।
- शम्भु प्रसाद
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