किसी से इश्क़ हो जाना
कहाँ हमारे इख़्तियार में होता है,
यह तो रूह की वह ख़ामोश पुकार है
जो बिना दस्तक दिए
दिल के किसी अनजान कोने में
आकर ठहर जाती है।
फिर हम चाहें भी तो
उस एहसास से बेख़बर कहाँ रह पाते हैं—
किसी की आवाज़ में सुकून मिलने लगता है,
किसी की ख़ामोशी में अपना अक्स दिखाई देता है,
और किसी की मौजूदगी
ज़िंदगी का सबसे ख़ूबसूरत हिस्सा मालूम होती है।
मगर हर इश्क़ का मुक़द्दर
मिलन नहीं होता।
कुछ मोहब्बतें
तक़दीर की किताब में
सिर्फ़ एक ख़ूबसूरत अध्याय बनकर आती हैं—
हमें छूती हैं,
हमें बदलती हैं,
और फिर ख़ामोशी से
हमारी ज़िंदगी से गुज़र जाती हैं।
पीछे रह जाता है
एक अधूरा-सा अफ़साना,
कुछ अनकही गुफ़्तगू,
कुछ बुझते हुए ख़्वाब
और एक ऐसा एहसास
जिसे वक़्त भी पूरी तरह मिटा नहीं पाता।
लेकिन शायद
मोहब्बत मिटने के लिए होती भी नहीं।
वह तो
धीरे-धीरे हमारे भीतर उतरकर
हमारी तासीर बन जाती है।
जिसे कभी हमने
किसी एक शख़्स के लिए महसूस किया था,
वही प्रेम
एक दिन हमें यह सिखाता है
कि किसी के साथ ठहरना क्या होता है,
किसी की ख़ामोशी समझना क्या होता है,
और किसी के टूटे हुए हिस्सों को
बिना सवाल किए
अपनी हथेलियों में सँभालना क्या होता है।
इसलिए शायद
बीती हुई मोहब्बत को भूल जाना
ही प्रेम का अंत नहीं है।
कभी-कभी
उसे दिल के किसी पाक कोने में
महफ़ूज़ रख देना भी प्रेम है—
बिना शिकायत,
बिना इल्ज़ाम,
बिना लौटने की आरज़ू के।
क्योंकि हर वह शख़्स
जिससे हमने कभी सच्चा प्रेम किया,
हमारी ज़िंदगी में
सिर्फ़ अपना हिस्सा लेने नहीं आता।
कुछ लोग
हमारे भीतर प्रेम का अर्थ छोड़ जाते हैं।
और फिर जब ज़िंदगी
किसी नए हमसफ़र का हाथ
हमारे हाथ में रखती है,
तो शायद हम उसे
अपने अतीत की परछाईं नहीं देते—
हम उसे
अपने अतीत से सीखा हुआ प्रेम देते हैं।
वही धैर्य,
वही अपनापन,
वही नर्मी,
वही शिद्दत…
मगर इस बार
एक नए रिश्ते के नाम के साथ।
तब समझ आता है—
कि कोई मोहब्बत
अगर हमारे साथ उम्र भर नहीं चल सकी,
तो इसका अर्थ यह नहीं
कि वह व्यर्थ थी।
शायद उसका मक़सद
हमारे साथ चलना था ही नहीं।
शायद वह तो
हमें उस इंसान के लिए तैयार करने आई थी
जो एक दिन
सचमुच हमारा हमसफ़र बनेगा।
और इसलिए
मैं अब अपनी पुरानी मोहब्बत को
भूलने की कोशिश नहीं करती—
मैंने उसे
एक दुआ की तरह रख दिया है।
न कोई शिकवा,
न कोई सवाल,
न लौटने की कोई ख़्वाहिश।
बस एक शुक्रिया—
कि उसने मुझे
मोहब्बत करना सिखाया।
क्योंकि आज
जो प्रेम मैं किसी अपने को दे पाऊँगी,
उसमें शायद
किसी पुराने इश्क़ की राख नहीं होगी—
बल्कि
उस इश्क़ से सीखी हुई
एक नर्म रोशनी होगी।
और शायद यही
मोहब्बत की सबसे ख़ूबसूरत विरासत है—
कि कोई हमारा होकर भी
हमारे साथ न रह सके,
फिर भी उसके हिस्से का प्रेम
हमारे भीतर इतना ज़िंदा रहे
कि हम किसी और के साथ
और भी सच्चे हो जाएँ।
आख़िर—
हर मोहब्बत का मुक़ाम
मिल जाना नहीं होता,
कुछ इश्क़
हमें किसी और की ज़िंदगी में
मुकम्मल मोहब्बत बनकर उतरने के लिए
अधूरा छोड़ जाते हैं।
और शायद
इश्क़ की असली फ़तह यही है—
कि जिसे हम रख न सके,
उससे मिली मोहब्बत को
हम अपने भीतर इतना पाक रख लें
कि वह किसी और के लिए
हमारी रूह से निकली
एक ख़ूबसूरत दुआ बन जाए।
-शांभवी श्रीवास्तव
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