जो घर निकल जाते हैं, वापस क्यों नहीं आते?
जो घर निकल जाते हैं,
वापस क्यों नहीं आते?
क्या रास्ते बदल जाते हैं,
या रिश्ते कहीं खो जाते हैं?
दीवारें तो वहीं रहती हैं,
दरवाज़े भी खुले रहते हैं,
बदलता है तो बस इंसान,
और उसके भीतर का मकान।
कुछ लौटना चाहते हैं,
मगर अहंकार रोक लेता है।
कुछ लौट नहीं पाते,
क्योंकि वक़्त उन्हें कहीं और मोड़ देता है।
घर सिर्फ़ ईंटों का नाम नहीं,
घर तो इंतज़ार की साँसों में बसता है।
जिस दिन कोई लौट आए मुस्कुराकर,
उसी दिन घर फिर से घर लगता है।
और जो कभी लौटकर नहीं आते,
वे अक्सर यादों में बस जाते हैं।
क्योंकि कुछ लोग घर छोड़ते नहीं,
अपने हिस्से की पूरी दुनिया साथ ले जाते हैं।
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