क्या तुम्हारे शहर से भी
चाँद आधा दिखता है?
या मेरी तरह वहाँ भी
कोई रातों में कम दिखता है?
यहाँ खिड़की पर बैठी रात
तेरा पता पूछती है,
हवा तेरे शहर की गलियों से
कुछ ख़बरें लाती है।
मैंने पूरा चाँद माँगा था,
पर किस्मत ने आधा दिया,
शायद तुमने भी मेरी तरह
कुछ ख़्वाबों को अधूरा जिया।
क्या तुम्हारे शहर में भी
तन्हाई इतनी गहरी है?
क्या वहाँ भी किसी के दिल में
मेरी तरह कोई कमी है?
चाँद तो एक ही है दोनों के बीच,
फिर दूरी इतनी क्यों लगती है?
शायद मोहब्बत पूरी हो तो
चाँद भी पूरा दिखता है।
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