आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

क्या तुम्हारे शहर से भी चाँद आधा दिखता है?

                
                                                         
                            क्या तुम्हारे शहर से भी
                                                                 
                            
चाँद आधा दिखता है?
या मेरी तरह वहाँ भी
कोई रातों में कम दिखता है?

यहाँ खिड़की पर बैठी रात
तेरा पता पूछती है,
हवा तेरे शहर की गलियों से
कुछ ख़बरें लाती है।

मैंने पूरा चाँद माँगा था,
पर किस्मत ने आधा दिया,
शायद तुमने भी मेरी तरह
कुछ ख़्वाबों को अधूरा जिया।

क्या तुम्हारे शहर में भी
तन्हाई इतनी गहरी है?
क्या वहाँ भी किसी के दिल में
मेरी तरह कोई कमी है?

चाँद तो एक ही है दोनों के बीच,
फिर दूरी इतनी क्यों लगती है?
शायद मोहब्बत पूरी हो तो
चाँद भी पूरा दिखता है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर