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अवांछित

                
                                                         
                            एक वृद्धा पार्क में बैठी
                                                                 
                            
एक छोटी बच्ची के बालपन को निहार रही थी
बार-बार उस बच्ची की नजर-
वृद्धा से टकराने पर वह दौड़ के आई
दादी माँ!आपको मुझसे कोई काम है
हाँ बेटी, तुमसे दोस्ती करनी है
अच्छा बताओ!तुम्हारा नाम क्या है
अवांछित....हाँ, यही नाम है मेरा
ये कैसा नाम है.......!
तुम्हारे मम्मी-पापा ने ये नाम रखा
नहीं... ये नाम मैं ख़ुद रखी हूँ
क्यों...!!!
क्योंकि, मेरे अंश होने की अनुभूति से
मेरे पैदा होने के सच तक
मेरा नाम आलोक, प्रकाश, आकाश आदि था
ऐसा माँ कहती है
लेकिन,मैंने सबको परास्त कर
घर की "आशा"पैदा ली
और!मैं..वांछित तो नहीं थी
इसलिए, मैंने अपना नाम "अवांछित"रख लिया
अब बताओ दादी माँ
तुम दोस्ती करोगी या मैं खेलने जाऊँ
हाँ,..... हड़बड़ाहट और सहमति में
वृद्धा ने अपना सिर हिलायी
फिर, उस बच्ची को गले लगायी
और ख़ुद का नाम "करुणा"होने का अर्थ
आज इस बच्ची के बातों से जान पाई।
-शैलजा झा
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2 वर्ष पहले

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