थोड़ा सा जाना पहचाना लगता है
शायद कोई दोस्त पुराना लगता है
आसां है इस चाँद को लाना धरती पर
मुश्किल तुझको यार मनाना लगता है
दुनियाँ भर के पकवानों से भी अच्छा
मुझको माँ के हाथ का खाना लगता है
चिड़ियों ने आँगन में आना छोड़ दिया
ढूँढा है कोई और ठिकाना लगता है
हिंदू मुस्लिम छोड़,यहाँ सब शायर हैं
सब का मुझको एक घराना लगता है
-शैलेश अग्रवाल "नीर"
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