चौसर
चौसर की रपटीली राहों के राही,
तुम हर बाज़ी जीत लेते हो—
बताओ,
तुम्हारी उस नायाब चाल का
राज़ क्या है?
वह मुस्कराया—
शह और मात के इस खेल में
कोई चाल
पहले कहाँ दिखाई देती है;
उसका अर्थ तो
बाज़ी बीत जाने के बाद खुलता है।
जैसी चाल,
वैसी बाज़ी—
इसीलिए शायद
चौसर केवल खेल नहीं,
चालों की दुनिया है।
ज़िंदगी भी
कुछ ऐसी ही चौसर है—
रास्ते रपटते रहते हैं,
पासे बदलते रहते हैं,
न कोई नियम स्थिर,
न कोई अपना हमेशा।
हम बस
एक लक्ष्य लेकर चलते हैं—
जीतने का।
मगर एक दिन
भीड़ से अलग
एक सवाल उठता है—
क्यों?
किसी के लिए
यह क्यों
खुशी है,
किसी के लिए सुख;
किसी के लिए
श्रेष्ठ होने की चाह,
किसी के लिए
दूसरों से आगे निकल जाना।
और किसी के भीतर
बहुत देर से दबा हुआ
एक और सवाल जागता है—
मनुष्य होने का
अर्थ क्या है?
चौसर में
कोई हारता है,
कोई जीतता है।
लेकिन जीवन में
अर्थ की खोज
न हार है,
न जीत।
वहाँ हर आदमी
अपनी-अपनी चाल चलता हुआ
धीरे-धीरे
अपने ही भीतर उतरता है—
अपने होने का
क्यों खोजने।
शायद ज़िंदगी की
सबसे बड़ी बाज़ी वही है
जिसमें पासे हमारे हाथ में नहीं होते,
फिर भी हम
अपनी चाल चुनते हैं।
और अंत में
जीत यह नहीं
कि बाज़ी किसने जीती—
जीत यह है
कि बाज़ी खत्म होने से पहले
हमें यह पता चल जाए
कि हम खेल क्यों रहे थे।
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