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ज़िंदगी का सफ़र  एक अंधा सफ़र है

                
                                                         
                            ज़िंदगी का सफ़र  एक अंधा सफ़र है,
                                                                 
                            
ला-पता है मंज़िल रास्ता पुर-ख़तर है।

ख़ुद-आगही की जानिब  बढ़ता हुआ,
तन्हाइयों से  वाबस्ता  तन्हा-सफ़र है।

अंजान  मराहिल से  बे-लौस गुज़रता,
सधे हुए पाँवों का  पा-बस्ता सफ़र है।

ज़िंदगी-मौत के दरम्याँ दूरियाँ घटाता,
एक  बे-तरतीब  बर-जस्ता  सफ़र है।

कुछ होश-मंदी में कुछ बे-ख़याली में,
जारी हर बशर  का ख़्वास्ता सफ़र है।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
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एक घंटा पहले

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