मेरे ख़्वाब-ओ-ख़यालों में रहते हो तुम,
दूर होकर कर भी मेरे पास रहते हो तुम।
कभी रूबरू मुलाक़ात करने नहीं आते,
पर तन्हाई में हर-दम साथ रहते हो तुम।
रश्क़ करता है ज़माना मेरे उस दिल से,
जिस दिल के आस-पास रहते हो तुम।
तुम्हारी अदा-ए-बे-नियाज़ी भी कमाल है,
जिसके बूते मेरे दिल में बसे रहते हो तुम।
ख़यालों के जहाँ को बे-रंग होने नहीं देते,
मेरे तसव्वुर में रोज़ नए रंग भरते हो तुम।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
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