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ख़्वाब-ओ-ख़यालों में

                
                                                         
                            मेरे  ख़्वाब-ओ-ख़यालों  में  रहते हो तुम,
                                                                 
                            
दूर होकर कर भी  मेरे पास रहते हो तुम।

कभी  रूबरू  मुलाक़ात करने नहीं आते,
पर तन्हाई में  हर-दम साथ रहते हो तुम।

रश्क़  करता है ज़माना  मेरे उस दिल से,
जिस  दिल के आस-पास  रहते  हो तुम।

तुम्हारी अदा-ए-बे-नियाज़ी भी कमाल है,
जिसके बूते मेरे दिल में बसे रहते हो तुम।

ख़यालों के जहाँ को बे-रंग होने नहीं देते,
मेरे तसव्वुर में रोज़ नए रंग भरते हो तुम।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
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15 घंटे पहले

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