सीख लेंगे जीना उम्र के साथ चलते-चलते।
जैसे सीखा है दर्द सहना दर्द सहते सहते।
चलना भी सीख लेंगे एक दिन ज़िंदगी में,
नशेब-ओ-फ़राज़ रास्तों पर चलते-चलते।
जीते जी हार न मानेंगे मसाफ़-ए-जीस्त में,
करेंगे बुलंद फ़तह का परचम लड़ते-लड़ते।
ग़म-ए-हयात की तपिश से हर्ग़िज़ न डरेंगे,
गुजार देंगे उम्र सारी आग में जलते-जलते।
रफ़्ता-रफ़्ता नजात मिल जाएगी अंधेरों से,
पा लेंगे हम अपनी मंजिल टहलते-टहलते।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
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