आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

रूदाद ए दिल

                
                                                         
                            तुम्हे अपनी रूदाद सुना नहीं पाए
                                                                 
                            
दिल की आग को ना ज़ुबाँ पे लाये
कभी शामें गुज़रती थी तेरी महफिल में
आज हम क्यूं हुए हैं पराये

अफसोस कि हम सफ़र ए मौत के
हो चुके मुसाफ़िर
संगदिल वो जब मिलने को आए
लहद में भी आती है बू बेवफ़ाई की
कुछ फूल तूने शायद क़ब्र पे चढ़ाए

लबों पे उनके है हल्का सा तबस्सुम
लगता है लाश पर हंसी उड़ाने को आए
भटकता फिरा हूँ मैं तन्हा जहां में
विरहा की धूप में ग़म ने किये साये

बात अपने दिल से कुछ निकलती है ऐसे
उनको लगता है नश्तर हैं चलाये
आखिरी सलाम मेरा कहना उनसे शाहिद
अलविदा अहले जहां,
ना आयेंगे चाहे जो बुलाए
-अश्क़ फ़तेहपुरी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
48 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर