तुम्हे अपनी रूदाद सुना नहीं पाए
दिल की आग को ना ज़ुबाँ पे लाये
कभी शामें गुज़रती थी तेरी महफिल में
आज हम क्यूं हुए हैं पराये
अफसोस कि हम सफ़र ए मौत के
हो चुके मुसाफ़िर
संगदिल वो जब मिलने को आए
लहद में भी आती है बू बेवफ़ाई की
कुछ फूल तूने शायद क़ब्र पे चढ़ाए
लबों पे उनके है हल्का सा तबस्सुम
लगता है लाश पर हंसी उड़ाने को आए
भटकता फिरा हूँ मैं तन्हा जहां में
विरहा की धूप में ग़म ने किये साये
बात अपने दिल से कुछ निकलती है ऐसे
उनको लगता है नश्तर हैं चलाये
आखिरी सलाम मेरा कहना उनसे शाहिद
अलविदा अहले जहां,
ना आयेंगे चाहे जो बुलाए
-अश्क़ फ़तेहपुरी
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