मुसलमान होना जुर्म है तो इस जुर्म की सज़ा दी जाए
मगर इस गुनाह की वजह भी बता दी जाए
कारवाँ गर अमन का तुम्हारी आंखों में चुभता है
तो ज़ुल्म की मशाल से इसमें आग लगा दी जाए
मैं ढूँढता हूं फिर पुराने हिंदुस्तान को
जहां नींद अपनी चादर उतारती थी
अज़ान की तकबीर से
मंदिर की घंटियों से
जहां अब्दुल वुजू करता था आबे गंगा से
राधा बच्चों को दम कराती थी मस्जिद के बाहर
मुझे हिन्दुस्तान की वही पुरानी शाम लौटा दी जाए
ये बच्चों के झगड़े
ये पड़ोसी के मसाइल
चलो इसमें धर्म की हवा दी जाए
सियासत की चाल है, धर्म का जो ये जाल है
सारे शहर में घूम के ये बात बता दी जाए
मैं राम का वंश हूँ और मुहम्मद का अंश हूँ
मुझे गीता व कुरआन की आयतें पिला दी जाएं
जहां राम ने ख़ुदा को और
ख़ुदा ने राम को ललकारा हो
मुझे युद्ध की वो भूमि भी दिखा दी जाए।
-अश्क़ फ़तेहपुरी
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