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यह मोड़ नहीं है अंत

                
                                                         
                            थक कर बैठ गए तुम क्यों?
                                                                 
                            
यह पथ छूटा तो रोते क्यों?
जो हाथ न आई छोटी जय,
उस ढहती दिवार को ढोते क्यों?
परिस्थिति से तुम अधिक लड़े,
सामर्थ्य झोंककर खड़े रहे,
फिर भी जो मंज़िल दूर रही,
उस बीते पल को रोते क्यों?
यह मोड़ नहीं है अंत सखे,
यह केवल कठिन अध्याय है!

लड़ना ही जिसका धर्म यहाँ,
वह हार देख क्यों टूट रहा?
अनुभव की इस जलती लौ से,
क्यों धीरज का दामन छूट रहा?
पहचान अपनी उस ताकत को,
जो इस असफलता ने दी है,
तू थका ज़रूर है राहों में,
पर हौसला तेरा नहीं छूट रहा!
उठ खड़ा हो फिर एक बार तू,
यह केवल कठिन अध्याय है!

लग चुकी तलब अब जीतने की,
खुद को अंगारों में झोंकेंगे,
जहाँ कोई राह न रोक सके,
उस महा-विजय को टोकेंगे!
ठोकरें चीखकर कहती हैं—
'तू गिरकर मारा जाएगा',
हौसले हँसकर कहते हैं—
'चल, देख लेंगे, देख लेंगे!
'तू बढ़ता चल, तू थमता क्यों?
यह मोड़ नहीं है अंत सखे,
यह केवल कठिन अध्याय है!
- शफ़क़ रऊफ
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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