कोड की त्रुटियों से विवश होकर,
कालिमा से, प्रकाश से,
या प्रतिकृति की चूक से,
कोशिका भूल जाती है अपनी शांत डगर।
यह 'प्रोटो-ऑन्कोजीन' है जो जाग उठा है,
एक उन्मत्त, अति-सक्रिय चीख में—
एक RAS, एक HER2/neu,
एक हरी बत्ती जो सदा के लिए जल गई।
विकास के संकेत अब स्वयं ही खिंचे चले आते हैं।
फिर ब्रेक फेल हो जाते हैं।
p53 या RB की दोनों प्रतियां नष्ट हो जाती हैं,
ट्यूमर को रोकने वाले जीन
निष्प्रभ और व्यर्थ हो जाते हैं।
विभाजन को थामने वाला कोई हाथ नहीं बचता,
विभाजन को सुधारने वाला कोई हाथ नहीं बचता।
यहाँ तक कि मृत्यु का आदेश भी विफल हो जाता है।
वह क्षतिग्रस्त हिस्सा खुद को मिटाता नहीं;
वह अमर हो जाता है, लांघ जाता है
अपने ही ऊतकों (टीश्यूज) की दीवारों को,
शरीर की इकलौती पुकार से पूरी तरह अंधा होकर।
और डीएनए मरम्मत करने वाले जीन सो जाते हैं।
बिना सुधरे, कोडिंग की गलतियाँ पनपती और बढ़ती हैं।
ट्यूमर गहराता जाता है।
त्रुटियाँ छलांग लगाती हैं।
- शफ़क़ रऊफ
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