सब कुछ निर्भर करता है,
राख के उस सटीक वज़न पर
धुएँ से गिरती धूसर चिंगारियों की
उस निश्चित संख्या पर...
जो उतरती हैं फेफड़ों में,
जहाँ कोशिका रखती है ...
अपना एक शांत बहीखाता।
एक कश कुछ भी नहीं।
दो, यानी संहिता पर बस एक खरोंच।
पर तीसरा—तीसरा तो एक दरवाज़ा है
जो खुल जाता है...
सिर्फ दोहराव के भारी बोझ से।
- शफ़क़ रऊफ
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