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चालक उत्परिवर्तन

                
                                                         
                            कोशिका के सूक्ष्म कुरुक्षेत्र में,
                                                                 
                            
नियति का रथ डगमगाया है।
यह 'चालक उत्परिवर्तन' ही तो है,
जिसने विप्लव का राग सुनाया है।

सहसा सोई जीव-ऊर्जा जागी,
पर मर्यादा के बंधन तोड़ चली।
मृत्यु-विहीन अमरता की चाह लिए,
वह अनियंत्रित सृजन की ओर चली।

न रुकती है थामे से यह गति,
न सुनती है तंत्र के प्रतिरोधी स्वर,
विषम घातों के झंझावातों में भी,
जी उठती है यह बनकर अजर।

संग बैठे हैं कुछ मूक 'यात्री' भी,
जो केवल समय की धारा में बहते हैं।
वे 'पैसेंजर म्यूटेशन' हैं केवल,
जो मौन रह कर सब सहते हैं।

गति को न वेग वे देते हैं,
न रथ की दिशा बदलते हैं,
विनाश के इस महा-अनुष्ठान में,
वे बस निष्क्रिय ही चलते हैं।

पर सुनो! इस तम के पार कहीं,
एक प्रज्ञा का संधान भी है।
जो रथ को गति दे रहा निरंतर,
उस 'चालक' की पहचान भी है।

विज्ञान रच रहा नूतन बाण,
लक्ष्य-भेद (Targeted Therapy) की तैयारी है,
चुन-चुन कर उस चालक को रोके,
अब ऐसी सुदृढ़ धनुर्धारी है।

थमेगा रथ, टूटेगा भ्रम,
जब रुक जाएगा वह मुख्य स्वर;
कोशिका फिर पाएगी समत्व,
शांत होगा यह भीषण समर।
- शफ़क़ रऊफ
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3 महीने पहले

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