तुम कहते हो मज़हब खतरे में है,
और हाथ में छुरी-तलवार उठा लेते हो।
सुनो!
जिसने इस पूरी कायनात को पाला है,
जो खुद सबकी ढाल है,
तुम उस खुदा को बचाने निकले हो?
कितने नादान हो तुम!
खुदा को ढूंढने खुदा की बनाई सरहदों के पार जाते हो।
जब अपने दुखों का ये भारी बोझ,
हमें खुद ही अपनी झुकी पीठ पर उठाना है,
जब भूख में रोटी और बीमारी में दवा,
हमें खुद ही कमा कर लाना है,
तो फिर क्यों?
क्यों हर बार हम उनकी सियासत की जंग में,
एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं?
तुम लाख हमें मज़हबों के नाम पर बांटो,
हम अपने हक़ के सवाल लेकर आएंगे।
तुम तलवारें चमकाओ,
हम अमन के गीत गाएंगे।
सब याद रक्खा जाएगा!
- शफ़क़ रऊफ
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