कि जिससे बेरुखी बरतें, तो दिल ख़ुद ही दुखे अपना,
जो ऐसा रंज उठने दे, उसे तुम इश्क़ का ग़म लो,
मोहब्बत इस को कहते हैं, मोहब्बत इस को समझो तुम।
किसी की पैरवी में भी, जो उस का लम्स बाक़ी हो,
वह दो पल का रफ़ाक़त भी, जो मुद्दत सी लगे तुम को,
मोहब्बत इस को कहते हैं, मोहब्बत इस को समझो तुम।
वह उस की तीमारदारी हो, या ना-थकने का अफ़साना,
जो दिल ये मान बैठे अब, कोई दूजा नहीं इस सा,
तो इस सादा-दिली को ही, अज़ल से तुम वफ़ा जानो,
मोहब्बत इस को कहते हैं, मोहब्बत इस को समझो तुम।
हुज़ूरी में तो डर खोए, ग़ीयाबी में भी हक़ उस का,
नसीबों की नशिस्तों पर, सदा नाम-ए-रवां उस का,
मोहब्बत इस को कहते हैं, मोहब्बत इस को समझो तुम।
जो रूठें उस से हम लेकिन, उदासी घेर ले दिल को,
ख़मोशी से ज़माने की, हर इक शय ख़ाली-ख़ाली हो,
असर उस की ही बातों का, जो हर महफ़िल पे तारी हो,
मोहब्बत इस को कहते हैं, मोहब्बत इस को समझो तुम।
निशानी उस की रख छोड़े, कोई जैसे ज़री का ख़्वाब,
हर इक चेहरे में चेहरा बस, उसी का ही नज़र आए,
जहाँ भी रास्ते जाएं,
उसी की सिम्त मुड़ जाएं,
ख़ुमारी हर घड़ी उस की,
रगों में जब उतर जाए,
मोहब्बत इस को कहते हैं, मोहब्बत इस को समझो तुम।
-शफ़क़ रऊफ़
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