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खुद ही से जंग का ऐलान होना चाहिए

                
                                                         
                            खुद ही से जंग का ऐलान होना चाहिए,
                                                                 
                            
अब इस कबीले में कोई सुलतान होना चाहिए।

जो घोंसलों की तरफ मैली आँख से देखें,
उन परिंदों की परों में उकाब होना चाहिए।

ये जो सियासत की बिसात पर मोहरे बने बैठे हैं,
इन भेड़ियों का सरेआम हिसाब होना चाहिए।

जो बस्तियां जलाकर हवाओं का रुख बदलते हैं,
उन आँधियों का भी तो कोई अंजाम होना चाहिए।

बहुत सह लिया तेरी धूप का सितम ऐ ज़ालिम,
अब इस ज़मीन पर भी सैलाब होना चाहिए!
- शफ़क़ रऊफ
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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