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फसल और फावड़ा

                
                                                         
                            हे पथिक! देखो उस हरी-भरी घाटी को,
                                                                 
                            
जहाँ कल एक युवा जीवन वसंत की तरह महक उठा था।
पर हाय! शरद ऋतु के आने से पहले ही,
वह सुबह के पाले की तरह चुपचाप विलीन हो गया।
क्रूर समय ने जैसे असमय ही सुनहरी बालियाँ काट ली हों,
और धरती की छाती पर छोड़ दी हों केवल बेजान, सूखी जड़ें।

शहर की तिजोरियों में सोने के सिक्के खनकते रहे,
मगर उस खनक में भोर के पंछियों का संगीत खो गया।जैसे बहती नदी की रेत उंगलियों से फिसल जाती है,
वैसे ही उसकी रातों की ठंडी, शांत नींद दूर छिटक गई।

सूरज की पहली किरण ने अभी पहाड़ियों को छुआ भी न था,
कि वह अपनी ही महत्त्वाकांक्षा के हल से खेतों को जोतने निकल पड़ा।
पर अफ़सोस! उस मायावी धन को मुट्ठी में भींचने की व्याकुलता में,
उसका जीवन-स्पंदन ऐसे अचानक थम गया,
जैसे सदियों पुराने फावड़े का मजबूत हत्था,
कठोर मिट्टी से टकराकर बीच से ही टूट गया हो।

देखो उस बूढ़े किसान को, जिसने जीवन की ढलती दोपहर में घर बसाया,
जब उसके बालों में जाड़े की बर्फ़ उतर आई थी।
फिर भी प्रकृति ने उसकी झोली भरी,
आंगन में किलकारियां गूंजीं,
और वह अस्सी की ढलती सांझ तक,
गाँव के चौराहे पर खड़े एक पवित्र बरगद की तरह अडिग रहा।
पर वहीं, एक दूसरा पथिक था,
जो भरी जवानी में दूल्हा बना,
और जीवन के महामेले के बीच में ही,
उसकी सांसों की डोरी ऐसे टूटी,
जैसे कोई राहगीर सफर के बीच ही थककर सो जाए।

मानव का यह लघु मस्तिष्क भी क्या अजीब चक्की है!जिसमें तृष्णा और भय के दाने रात-दिन पिसते रहते हैं।लगातार एक अनसुना शोर, कुछ खोने का अनवरत डर।पर इस शाश्वत धरती का,
इस पवित्र मिट्टी का सबसे बड़ा सच यही है—
अपनों के साये का दूर चले जाना,
और समय की अमूल्य नदी का चुपचाप बह जाना।

हमारी अधूरी ख्वाहिशें तो उस मरुस्थल की मरीचिका जैसी हैं,
जो चिलचिलाती धूप में प्यासे हिरण को पानी का छलावा देती हैं।
उस काल्पनिक क्षितिज को छूने की अंधी, उन्मादी दौड़ में,
हम भूल जाते हैं कि हमारी अपनी ही अंजलि में,
जो शुद्ध, शीतल जल विधाता ने दिया था,
वह कब का बूंद-बूंद करके सूखी धूल में मिल चुका है।

इसलिए, हे धरती के पुत्र! महत्ता इस बात में नहीं कि तुमने कितनी लंबी दौड़ लगाई,
महत्ता तो इस मिट्टी की खुशबू को,
और समय के इस पवित्र चक्र को,
समय रहते पहचान लेने में है।

-डॉ शफ़क़ रऊफ
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

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