देर क्यों हुई!
हाँ, मुझे देर हुई!
क्योंकि मैं अकेली लड़ती रही
उस भीड़ से, जो बैठी थी घात लगाए,
मगर मैं समझौते के समझौतों से मुकरती रही।
मुझे देर हुई...
क्योंकि मुझे गंवारा न था,
कि चापलूसी की सीढ़ियाँ चढ़कर
मैं किसी बौनी छत का हिस्सा बनूँ।
मुझे तो अपनी खुद्दारी के परों से
इस असीमित आसमान को नापना था।
हाँ, मुझे देर हुई...
क्योंकि कुछ लापरवाही मेरी भी थी,
मैने पहाड़ों की आज़ाद वादियों से ज़्यादा
उन ढहते हुए रिश्तों को थामना चाहा।मैंने नेकदिली की खैरात बाँटी,
और बदले में सिर्फ सन्नाटे बटोरे।
पर सुनो! मुझे मलाल नहीं इस देरी का,
क्योंकि मैं जान चुकी हूँ—
खुश रहने के लिए खूबसूरत ज़िंदगी तो ज़रूरी है,
पर उस ज़िंदगी को जीने के लिए,
मेरा खुद के भीतर 'ज़िंदा' और 'बेहतर' रहना,
उससे भी कहीं ज़्यादा ज़रूरी है!
-शफ़क़ रऊफ
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