मस्तिष्क के नीरव धरातल पर अगर अंकुर उगे,
तो चेतना के वेग को अवरुद्ध तुम मत होने दो।
पीड़ा-जलधि के गर्त से यदि गूँजता साहित्य हो,
तो उस परम दर्शन-सकल को विश्व में बहने दो।
अन्तस्तल में जो छिपी निष्कम्प सी चिंगारी है,
वह मन्द केवल राख का कोई सिरा हरगिज़ नहीं।
वह तीव्र पावन ज्ञान की आलोक-निर्मित आदि है,
बनकर मशाल उसे तिमिर के भाल पर जलने दो।
गृह-सीमा में बैठे हुए चिन्तन निरन्तर व्यर्थ है,
गतिहीन रहकर कब भला संसार यह बदला यहाँ?
सत्य की निष्पक्ष, अविरल खोज में आगे बढ़ो,
नियमों के इस ब्रह्मांड को बाहर निकल गढ़ने दो।
वर्षा-ऋतु की सजधज केवल मयूरी का रूप है,
क्षणभंगुर उस शृंगार से ऊपर उठो, आगे बढ़ो।
सिंहनी की भाँति निडर होकर परम-सत्य को चुनो,
भ्रम के कुहासे को चीरकर आगे कदम धरने दो।
यदि रोकना ही है, तो रोको क्रोध के उस ज्वार को,
मस्तिष्क के जालों-विकारों का दमन तुम शांत कर।
पर असमय ही जो प्रकृति ने रक्त-पल्लव दिए,
उस लालिमा के रंग को पत्तों पर अब चढ़ने दो।
-डॉ शफ़क़ रऊफ
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