ऐ ज़िंदगी, तुझसे एक शिकायत है,
कभी धूप, कभी छाँव, कभी दर्द की इनायत है।
कभी अपनों ने सिखाया, कभी वक़्त ने समझाया,
जिसे अपना समझा, उसी ने पराया बनाया।
कभी आँखों में सपने, कभी दिल में सवाल रहे,
हम हँसते तो रहे, मगर भीतर कई मलाल रहे।
हर बार टूटा, फिर ख़ुद को सँभाल लिया,
जो मिला नहीं, उसे क़िस्मत के नाम कर दिया।
अब न किसी से शिकायत, न किसी से गिला है,
जो भी मिला इस सफ़र में, कुछ पल का सिलसिला है।
अब ख़ुद की ख़ुशी को भी अहमियत देना सीखा है,
हर किसी को ख़ुश करते-करते, ख़ुद को खोना छोड़ दिया है।
ऐ ज़िंदगी, अब तुझसे बस इतनी-सी गुज़ारिश है,
जो कल छिन गया, उसका ग़म नहीं…
आने वाले कल से एक नई ख़्वाहिश है।
अब गिरूँ तो उठने का हौसला देना,
ख़ामोश रहूँ तो ख़ुद को समझने का रास्ता देना।
क्योंकि अब समझ आया है मुझे,
ज़िंदगी सिर्फ़ साँसों का नाम नहीं,
ख़ुद से मोहब्बत करने का नाम भी है।
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