गगन में ढूंढा है तुझको,
पवन ने ढूंढा है तुझको।
मिला ना तू कहीं मुझको,
पाया है मुझमें ही तुझको।
गगन में होता पंछी मिलन,
पवन में रहती ठंडी सीलन।
फिर भी ढूंढ रहा क्यों इनमें,
तुझको मेरा ये पागल मन।।
नीर में ढूंढा है तुझको,
तीर पे ढूंढा है तुझको।
मिला ना तू कहीं मुझको,
पाया है मुझमें ही तुझको।।
नीर में बहती धारा है,
तीर का अजब नजारा है।
व्योम से धरती तक ढूंढा,
अब तो मन मेरा हारा है।।
सागर में ढूंढा है तुझको,
गागर में ढूंढा है तुझको।
मिला ना तू कहीं मुझको,
पाया है मुझमें ही तुझको।।
सागर में मोती पाया है,
गागर में नीर भराया है।
भर सागर को गागर में,
तू मुझमें ही समाया है।।
अपनों में ढूंढा है तुझको,
सपनों में ढूंढा है तुझको।
मिला ना तू कहीं मुझको,
पाया है मुझमें ही तुझको।।
अपनों ने मोह भरमाया है,
सपनों ने टूट रुलाया है।
तोड़ स्वार्थ के सब रिश्ते,
गुरु ने प्रियतम से मिलाया है।।
- सावित्री स्वामी
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