संसार है सागर में लहरें,
मानव है मछली समान।
बाहर क्या ढूंढे रे प्राणी,
तुझमें ईश्वर तू ही शैतान।।
उठती लहरें मिटती लहरें,
चलता रहेगा समय का चक्र,
एक जन्मेगा एक की मृत्यु,
क्यों करता प्राणी इतना फक्र।।
सत्यता को ठोकर मारे,
समझ रहा अपना अपमान।
बाहर क्या ढूंढे रे प्राणी,
तुझमें ईश्वर तू ही शैतान।।
पूजा करता धर्म करता,
करके दान तू पुण्य कमाता।
है वो भी किसी मां का लाल
जिस जीव को तू काटके खाता।।
मंदिर जाता मस्जिद जाता,
मिटता नहीं फिर भी अभिमान।
बाहर क्या ढूंढे रे प्राणी,
तुझमें ईश्वर तू ही शैतान।।
पंछी को तू दाना डाले,
पशु पे प्यार दिखाता है।
डालकर पंछी पिंजरे में,
जीव जंगल से उठाता है।।
बनकर क्यों इतना पाखंडी,
करता फिरे खुद पे गुमान।
बाहर क्या ढूंढे रे प्राणी,
तुझमें ईश्वर तू ही शैतान।।
तीर्थ जाता गंगा नहाता,
तू करता है नदियों को गंदा।
पहाड़ काटकर वन उजाड़कर,
तू करता स्थापित उद्योग धंधा।।
एक दिन प्रलय मचने वाली,
नहीं किया प्रकृति का सम्मान।
बाहर क्या ढूंढे रे प्राणी,
तुझमें ईश्वर तू ही शैतान।।
- (सावित्री स्वामी)
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