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निज ह्दय के भावों को अब मुझको करना व्यर्थ नही

                
                                                         
                            अपनी अपनी मर्यादा है वो बोले हम मौन रहे
                                                                 
                            
अन्तर्मन की पीड़ा को अब उनसे कौन कहे
इर्ष्या मन ही है जो प्रगति मेें उनकी बाधक है
शब्द उनके जहरीले तीरो से ज्यादा घातक हैं
समझ सकें मुझको इतना, उनमें सामर्थ्य नही
निज ह्दय के भावों को अब मुझको करना व्यर्थ नही
प्रेम नही यदि आपस में तो हर रिश्ता बेईमानी है
उनको अपना समझते रहना सबसे बड़ी नादानी है ।
मैने यथाशक्ति सबको प्रेम और सम्मान दिया
बदले में की नफरत मुझसे सदा मेरा अपमान किया
किन्तु पीना अब अपमानों के कड़वे घूंट स्वीकार नही
तोड़ना केवल झूठे रिश्ते ,लेना कोई प्रतिकार नही
टूटे प्रीत के धागे में अब कोई गाँठ नही लगानी है
निज सम्मान ही सर्वोपरि है बस बात यही समझानी है ।।
- सविता शुक्ला
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1 hour ago

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