जीवन नदी है, बहना सीखो,
पर्वत बनकर अड़ना क्या।
सत्य कठिन हो, फिर भी चुनना,
झूठ के आगे झुकना क्या।
मौन जहाँ आवश्यक हो,
वहाँ शब्दों का भार न दो।
प्रेम मिले तो बाँटते जाना,
मन में कोई द्वार न दो।
समय किसी का सगा नहीं है,
कर्म सदा पहरेदार रहे।
अहंकारों के ऊँचे महल,
क्षण में धूल समान ढहे।
अंत यही—जो दे गया जग को,
वही अमर पहचान बना।
जो स्वयं में प्रकाश जगा ले,
वही जीवन का ज्ञान बना।
- सौरभ पाण्डेय
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