सच सच बताया दाज्यू,
याद आणि आपुण पहाड़?
आमा-बुबू को ऊँ दुलार,
ईजा-बाबू दगड़, होई दिवाई-त्यार
राखी का दिनों में, बहिण्यूँ को प्यार,
फूलदेई में चेली-बेटियूँ फूल-बौछार।
उत्तराणिक कौतिक, औ नंदा की पुकार,
आ जावा भै-बहिन्यूँ, आपुण य पहाड़।
सच सच बताया दाज्यू,
याद आणि आपुण पहाड़...
असाड़ क मैण में जाँ छी रोपणी-धान,
सौण क मईण हूँ छ हरियाव त्यार
असौज क मैण में लगि जाँ छी घाँस को कटान,
कतुक प्यार! लागी छ हमकैं आपुण
सच सच बताया दाज्यू
याद आणि आपूण पहाड़
डाँना-काँना चमकाणि,
ऊ बुराँश जस लाल घाम,
'काफल-पाको' कूँणि,
य चैत की पुकार।
सच सच बताया दाज्यू
याद आणि आपूण पहाड़
गोर-बाछुन लेइबे, जंगौ जाड़,
कुबेर ह्वै जाण में, ईजा-बाबू को रिसौड़।
याद छू नौ-पाणी की ऊ मधुर मिठास,
गागरी भरी बेर, ल्यूँ छी हम रत्तैं ब्यांण।
सच सच बताया दाज्यू,
याद आणि आपुण पहाड़...
भट की चुटकाणी, औ झोली-भात,
आल्-टमाटर औ मेथी साग।
दूध-द्यूँ- दै की भारी भँकार,
माल्टा दगड़ी -
सिल-बट्ट में पीसी, लूण सुवाद।
सच सच बताया दाज्यू,
याद आणि आपुण पहाड़...
याद छ तुमकैं ऊ पाथर वाल मकान,
घर भितेर जाण कूँ ऊ खोई वाल द्वार।
अब त खोजे लेई नी मिलनी घिनौड़ी की ऊ पुकार,
सच सच बताया दाज्यू,
याद आणि आपुण पहाड़
भाग दौड़ की ई दूनी में, उ सुख काँ छू यार?
जब-जब याद आणि उ पवित्र धरती की,
आँखी भरि युनि मेरी, याद आणि आपुण पहाड़।
सच सच बताया दाज्यू,
याद आणि आपुण पहाड़...
-सौरभ जोशी
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