आसान नहीं है इस दुनिया में बेटी होना,
चुपचाप हर एक गहरे दर्द को भीतर ही सहना।
बचपन की नादान उम्र से ही धीरज रखकर,
उम्र से पहले ज़िम्मेदारियों के साँचे में ढलना।
हर मोड़ पर वह ज़माने की ठोकर खाकर,
हँसते-हँसते हर मुश्किल से लड़ जाती है।
जिस पीहर में वह नाज़ों से ‘अमानत’ कहलाती है,
वही बेटी ससुराल में जाकर क्यों पराई हो जाती है?
वह बेटी बनकर अपना हर फ़र्ज़ निभाती,
अपने आचरण से माता-पिता का मान बढ़ाती।
अपने मासूम सपनों और दबी चाहतों को,
बस अपनों की ख़ुशी की खातिर पीछे छोड़ जाती।
खुद के सारे सुख पल में भुलाकर जो,
अपने प्यारे भाई की खुशियाँ सजाती है,
माँ-बाप के अनजाने ग़ुस्से को भी चुपचाप सहकर,
जो भाई के आगे हर बार ढाल बन जाती है।
वही आगे चलकर पत्नी बनकर,
हर नए रिश्ते को पूरे मन से अपनाती है।
साँस-साँस में अपने हर फ़र्ज़ को निभाकर,
रिश्तों में प्रेम और विश्वास सजाती है।
पति की छोटी-छोटी खुशियों में अपनी खुशियाँ ढूँढे,
और उनके मुस्कुराने भर से खुद भी मुस्कुराती है।
फिर ढलकर माँ के रूप में,
वह पावन ममता की मूरत बन जाती है।
हमारे दिल की धड़कन बनकर,
प्रेम का अथाह सागर बन जाती है।
ज़िंदगी भर अपने सुख की परवाह किए बिना,
हँसते-हँसते अपना सर्वस्व लुटाती है।
वह सबके बेरंग जीवन में खुशियों के रंग सजाती,
पूरे कुल का गौरव, पूरे घर की शान बन जाती है।
औरों को समाज में ऊँचा सम्मान दिलाकर,
चौखट के पीछे वह अपनी पहचान भुला जाती है।
लोग कहते हैं, बेटे उन्मुक्त गगन के पंछी हैं,
जो बिना किसी बंदिश के खुले आसमाँ में उड़ते हैं।
पर ये बेटियाँ आज भी चारदीवारी के अनकहे बंधनों में,
कितनी ही बार ख़ामोशी से अपना जीवन बुनती हैं।
सदियों से जो चलता आया है यह गहरा भेदभाव,
क्या आज के दौर में भी यूँ ही कायम रहेगा?
आओ, पुत्र-पुत्री का यह खोखला भेद मिटाकर,
इन बेटियों को उनका सच्चा सम्मान दिलाएँ।
सोच और आधुनिकता के इस सुनहरे दौर में,
आओ हम सब मिलकर ऐसा इतिहास बनाएँ,
जहाँ बेटी होना बोझ नहीं, गौरव कहलाए,
हर बेटी अपने सपनों को सच करके दिखलाए।
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