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आधुनिकता के साए में, झुलस रहा है भारत आज

                
                                                         
                            आधुनिकता के साए में, कैसा बदला भारत आज?
                                                                 
                            
यह विज्ञान वरदान बना है, या बन बैठा है कोई अभिशाप?

इस युग ने नई राह दिखाई,
सुख-सुविधाएँ भी खूब बढ़ाईं।
शिक्षा-दीक्षा का विस्तार किया,
विज्ञान ने जग को साकार किया।

जीवन में नव श्रृंगार किया,
हर क्षेत्र का विस्तार किया।
लेकिन सब कुछ विकसित होने पर भी,
बहुत कुछ पीछे छूट गया।

अच्छा हुआ, कुरीतियाँ छूटीं,
लेकिन दया-भाव भी छूट गया।
इतना सब कुछ पाकर भी मानव,
अपने ही जीवन से रूठ गया।

अपने संस्कारों को छोड़ चले,
भारत की रीति तोड़ चले,
माँ की ममता को भूले हम,
पिता की इज़्ज़त छोड़ चले।

जिनसे पाकर यह जन्म लिया,
जिन्होंने हमको संसार दिया,
बेबस कर उन बूढ़ी आँखों को,
वृद्धाश्रम की ओर चले।

माँ-पापा की डाँट से बचने,
दादा-दादी के पास छुप जाते थे,
जिस गोदी में जन्नत मिलती थी,
आज उसी को छोड़ चले।

जिसने जीवन भर कष्ट सहा,
मार्ग हमारा प्रशस्त किया,
अपनी खुशियों की आहुति देकर,
सुंदर हमारा भविष्य किया।

जिस पिता ने पूरे कुनबे को,
एक धागे में पिरोकर रखा था,
क्या आधुनिकता की कैंची ने,
उस धागे को तार-तार किया?

बच्चों का बचपन रूठ गया,
मासूमियत को इंटरनेट लूट गया।
गाँव से नाता टूट गया,
आँगन का अपनापन छूट गया।

बचपन में जो खेल रचा करते थे,
वे खेल भी न जाने कहाँ गए,
चेहरों के नूर भी छूट गए,
वो नादानी भी छूट गई।

जीवन मोबाइल में सिमट गया,
अपनों से नाता टूट गया।
कमरों में कैदी बनकर के,
जीवन भी सारा बीत गया।

एक रुपए की चार टॉफियाँ,
मित्रों के संग बाँटा करते थे,
एक चूरन की पुड़िया पर,
माँ की डाँट सुना करते थे।

हल और बक्खर पीछे छूटे,
ट्रैक्टर सब कुछ लूट गया।
धरती का सीना चीरने वाले,
बैलों का कंधा टूट गया।

जो सदियों तक अन्न उगाते,
कुनबे का बोझ उठाते थे,
मशीनों के इस दौर में आज,
उनका जीवन भी बिखर गया।

जिस गौमाता का अमृत पीकर,
इस काया को पुष्ट किया,
उसकी दयनीय दशा ने आज,
मेरे अंतर्मन को झकझोर दिया।

सड़क पर दर-बदर भटकती है,
कूड़े में निवाला ढूँढ रही,
कौन सुनेगा उसकी करुणा,
जो सर्दी में ठिठुर रही।

जिसने माँ बनकर पाला हमको,
और जीवन को पोषण दिया,
आज उसकी बेबसी देखकर,
मेरा दिल भी दहल गया।

क्या यही आधुनिकता का सच है?
क्या यही विकास की है पहचान?
जो इंसानों को मशीन बना दे,
क्या वह सच में है वरदान?

आधुनिकता के साए में, झुलस रहा है भारत आज,
खुद से हम यह पूछ रहे हैं—
यह प्रगति है या कोई संताप?
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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