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यह तन मन कुछ भी अपना नहीं है।

                
                                                         
                            आज सपना अपना नहीं है
                                                                 
                            
रविवार भी अपना नहीं है
नौकरी में सपना सपना नहीं है
यह तन मन कुछ भी अपना नहीं है।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

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