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वो मुनफ़रिद सी ठहरी

                
                                                         
                            उसने दी इजाजत
                                                                 
                            
अपनी तम्मनाओं को
जाहिर किया मुझसे
चंद लफ़्ज़ों में मेरे
जज्बातों को सुनने की
ख्यालों में जो न थी कभी मेरे
उसके लफ़्ज़ों ने कर दिया जादू
अब खुदा की बज़्म पर
एक अर्जी मेरी भी जायेगी
वो जो पहले से ठहरी
ठंडी बयार सी अनूठी सी
मेरी भी मान लें इल्तिज़ा इतनी
मेरी नज़्मों को गुनगुनाने की
 
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2 महीने पहले

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