काला हो गया दिन आज का,
जैसे हो गई रात आज की
बारिश भी आई इस दिन,
सूरज भी ढल गया घड़ी भर इस दिन
देख न सका बादल भी यह दिन,
आसमाँ भी रोया इस दिन
क्योंकि...
काला हो गया दिन आज का,
जैसे हो गई रात आज की
आस...
आस छुट गई उस माता की
जिसने खोया है आंख का तारा
पहाड़ टूट गया सब्र करना था
दिल रोया अब बन झरना-सा
क्योंकि...
काला हो गया दिन आज का,
जैसे हो गई रात आज की
सुनी पिता ने शहादत की जब
जमीं फिसल गई पैरों तले की अब
छुटा दामन आया बुढापा
अब कौन बनेगा उस भले का सहारा
क्योंकि...
काला हो गया दिन आज का,
जैसे हो गई रात आज की
कलाई सुनी हो गई अब
कभी खेला करते थे बचपन सब
बहन भी कितनी भोली थी जब
सुनकर हो गई पागल-सी ये सब
अरे पता तो सब को चला ही होगा...
काला हो गया दिन आज का,
जैसे हो गई रात आज की
आंखे तरस गई थी जिसकी
ज़िंदा मिलन की आस थी उसकी
पल भर में मिट गया लाल कथ्थई (सिन्दूर)
सोचा न था उसने ये कतई
कहा न जायेगा अब मुझसे
पर करता हूँ कोशिश कहने की
उन आंखों की दो बून्द देखकर
इन्द्र भी छटपटाया होगा
जब मेहन्दी वाले हाथों ने
मंगलसूत्र चुड़ा उतारा होगा
बात वही है बदली नहीं है
वीर शहीद हो गये हैं
इंकलाब से जीना सीखा गये हैं
बस फ़िर वही कि...
काला हो गया दिन आज का,
जैसे हो गई रात आज की
मालुम हुआ नन्ही चिड़िया को
हरि (पिता) आये बाद घर बरसों
सीमा न रही थी उसके चहकने की
नाच लिया आँगन सारा ही
सुना उसने जब सूना हो गया
ठगी-सी रह गई बन मुर्ति अहा
क्योंकि...
काला हो गया दिन आज का,
जैसे हो गई रात आज की
सब देख लाल जब बोल उठा
खून उसका अब उबल उठा
कहा उसने यह शब्द नहीं थे
ज्वाला थी यह चिता पिता की
अरे लुंगा बदला, बदला लुंगा
आँच न किसी पर आने दूँगा
चालीस गये चार सौ लाऊँगा
कब्र आतंक की वही बनाऊँगा
'सत्यम्' वचन बोलू कैसे मैं
शब्द नहीं है पुलवाला शहादत में
अब कलम रो पड़ी यह लिखते मेरी
लाल पड़ी है जमीं माँ तेरी.....
क्योंकि...
काला हो गया दिन आज का,
जैसे हो गई रात आज की
- सत्यम् प्रभु
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