प्रतीक्षा
का अंत
कभी नहीं होता
मील के पतथर
जरूर
आते हैं
लेकिन
मंजिल दूर
बहुत दूर....
नजर आता है
पथिक
चलता रहता है
न चाहते हुए भी
चलते रहना पडता है
कभी दौड़ते हुए
कभी उछलते हुए
कभी घसीटते हुए.
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X